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   राजस्थान का गणगौर पूजन 
   दाम्पत्य-प्रेम के उच्च आदर्श की शिक्षा राजस्थान में ईश्वर-गौरी (ईशर-गणगौर) के महोत्सव के रुप में देखी जाती है | राजस्थान में गौरी-पूजा सौभाग्यवती स्त्रियों और कन्याओं का खास त्यौहार है | यहां कन्याओं के लिये विवाह होते ही प्रथम चैत्रमास में एक-दो दिन नहीं पूरे पन्द्रह दिन तक 'गणगौरि' पूजा करना अवश्य पालनीय कर्त्तव्य समझा जाता है | होलिका-दहन के पश्चात् चैत्रारम्भ होते ही तालाब से मिट्टी लाकर ईश्वर और गौरी की मूर्तियाँ बनायी जाती है, जिनको सौभाग्य की कामना से विवाहिता और योग्य वर पाने की इच्छा से कुमारी कन्याएँ श्रद्धा के साथ प्रतिदिन लगातार पूजती हैं | पूजा के लिये हरी दूर्वा, पुष्प और जल लाने की अपनी-अपनी टोली बनाकर लड़कियाँ प्रातःकाल सुमधुर गीत गाती हुई निकलती हैं | प्रत्येक विवाहिता लड़की अपने 'ब्यावले वर्ष' (विवाह वाले वर्ष) की गणगौरी अपनी छः, आठ या दस संख्यक अन्य अविवाहिता साथिनों को वरणपूर्वक साथ लेकर पूजती है | सौभाग्यवती उस विवाहिता लड़की को मिलाकर उस तुंग की लड़कियों की संख्या सात, नौ या ग्यारह तक हो सकती है | यह क्रम चैत्रकृष्णा 1 से आरम्भ कर शुक्ला 3 तक रहता है | चैत्रशुक्ला 3 को प्रातःकाल की पूजा के बाद मध्याह्वोत्तर (शुभ वार हुआ तो उसी दिन, नहीं तो दूसरे दिन) तालाब में और जहाँ तालाब न हो वहाँ कूएँ में, ससमारोह मंगल-गान के साथ प्रतिमा-विसर्जन किया जाता है | 'गणगौरी' की विदा अथवा प्रतिमा-विसर्जन दृश्य देखने ही योग्य होता है | इसमें लड़कियाँ और स्त्रियाँ सभी सुसज्जित वस्त्र और आभूषण-धारण पूर्वक भाग लेती हैं | उनकी सम्मिलित कण्ठध्वनि के सामयिक गीत बड़े सुहावने और चित्ताकर्षक होते हैं | 'ईश्वर-गौरि' की वे ही मूर्तियाँ जल में पधरायी जाती है जो पन्द्रह दिन तक पूजने के लिये मृत्तिका की बनायी जाती हैं|                  

             
         भगवान् शंकर - पार्वती

         Gangaur - Isher and Gauri
        गण-गौरि ( ईश्वर और गौरी )

  

   पार्वती की पति-भक्ति
  
देवादि देव भगवान् शंकर की अर्द्धांगिनी पार्वती की पति-भक्ति अतुलनीय है | सावित्री और सीताजी ने भी उमा पार्वती का ही पदानुसरण करना अपना ध्येय माना | वस्तुतः सनातन - सभ्यता में जो कल्याणमय दाम्पत्य-प्रेम है, उसकी मन्दाकिनी का स्त्रोत 'शंकर-पार्वती' से ही आरम्भ होता है | 
    गर्वोन्मत्त दक्ष द्वारा अपने पति सदाशिव का अपमान सती सहन न कर सकी और उसने 'तज्जन्म धिग यन् महतामवद्यकृत्' उस जन्म को धिक्कार है, जिससे अपने आराध्य का अपमान होता है, इस भावना से अपने शरीर को ही त्याग दिया, जो दक्ष से उत्पन्न हुआ था | सती के आत्म-त्याग इस उज्ज्वल उदाहरण पर ही सती-प्रथा का जन्म हुआ और हिन्दु जाति ने इसको इतना अपनाया कि ब्राह्मण से लेकर शूद्रपर्यन्त कोई भी ऐसा हिन्दु-परिवार न होगा जिसके कुल में पति पर आत्मोत्सर्ग करने वाली सती न हुई हो|
   सती ने ही पर्वतराज हिमालय के गृह में जन्म धारण कर 'पार्वती' नाम पाया था | कवि कालिदास ने अपनी अमर कृति कुमार-सम्भव में पार्वती जी की एकान्त-भक्ति का पवित्र और सुन्दर चित्र बड़ी निपुणता के साथ अंकित किया है |
    देवर्षि नारद से पार्वती सुन चकी थी कि प्रेमबल से एक दिन वह महादेव की अर्द्धांगिनी बनेगी, मृत्यु को भी जीतने वाले भूतनाथ के ह्रदय को जीत लेने में समर्थ होगी | पार्वती ने अपने ह्रदय में इस भावना को अंकित कर लिया | इसके अनन्तर समय पाकर शंकर ने समाधि लगायी और पार्वती ने पिता की आज्ञा से शंकर को पति की कामना से सेवा आरम्भ की |
पार्वती की कठिन तपस्या
    पार्वती की सेवा में कामगन्धवर्जित विशुद्ध सेवा-भाव था और उस सेवा में पार्वतीजी ने अपने आपको सब तरह से लगा दिया | दिन के बाद दिन, पक्ष महिना, वर्ष और यों ही एक लम्बा समय बीत गया; किन्तु चन्द्रशेखर की पलकें नही खुलीं | अपनी समाधी में ही वे संलग्न थे | उसी अवधि में वहाँ इन्द्रादि देवों की योजना से समाधि भंग करने के लिये वसन्त और रति सहित मदन का अगमन हुआ | यावच्छक्य बलोदय अपना प्रभाव दिखाकर मदन भी परास्त किया हतमनोरथ ही ;नहीं, प्रत्युत शंकर के क्रोधानल से भस्म हो गया | पश्चात पार्वती ने और भी कठिन तपस्या द्वारा भगवान् शंकर की कृपा लाभ करने का निश्चय किया | महाकवि कालिदास कहते हैं -

                     उ मेति मात्रा तपसो निषिद्धा
                     पश्चादुमाख्यां सुमुखो जगाम |

   'माता के द्वारा बार-बार तपका निषेध किये जाने पर ही पार्वती का उमा नाम हुआ' | अस्तु पार्वती ने अपने संकल्पानुसार दृढ़ता के साथ एकनिष्ठ होकर तप आरम्भ कर दिया |  क्योंकि उसने समझ लिया कि तपस्वी के ह्रदय को जीतने के लिये तपस्या आवश्यकता है | गौरी की कठिन तपस्या ने सबको आश्चर्यचकित स्तम्भित कर दिया | तपस्या कभी व्यर्थ नहीं जाती | उमा की तपस्या सफल हुई | आशुतोष भगवान शंकर का आसन हिला और उन्होंने प्रसन्न होकर पार्वती की आकांक्षा पूर्ण की | भगवती उमा-पार्वती को अपनी देहार्द्धभागिनी बनाया | 
   हिन्दु-शास्त्रों में सदाशिव की जो सनातन-मूर्ति बतायी गयी है, उसमें शिव ध्यानमग्न समाधी लगाये हुए आत्म-चिन्तन कर रहे हैं | शंकर का आत्म-चिन्तन क्या है, अपने रचे हुए विश्व का निरीक्षण | क्योंकि वे विश्वरुप हैं और विश्व उनका रुप है | अतएव विश्व का निरीक्षण शंकर का आत्म चिन्तन हैं | उनकी सहायता शक्ति पार्वती आत्म-चिन्तन निरत सदाशिव की सेवा में सावधान विराजमान हैं | शिव की आज्ञा से उसने ही विश्व को प्रकृतिरुप से रचा है | शंकर का पत्नीप्रेम आदर्श है, उसी प्रकार उमा की पतिभक्ति आदर्श है |
  राजस्थानी राजघरानों की ओर से 'गण-गौरि' की सवारी
राजघरानों की ओर से 'ईश्वर और गौरी' की जो सवारी निकलती है वह यथास्थान सरोवर या तालाब के किनारे पहुँचकर 'राग-रंग' होने के बाद राजप्रासाद को लौट आती है | ये मूर्तियाँ (ईश्वर और गौरी) कद में आठ-दश वर्ष के बालक-बालिका के समान बनी हुई होती हैं | गौरी को अधिक से अधिक सुन्दर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित किया जाता है | ईश्वर को ढाल-तलवार धारण कराकर वीर-वेश बना दिया जाता है | 
'ईश्वर-गौरी' अथवा राजस्थानी भाषा में 'गण-गौरि' की सवारी में राज्य के राजा किंवा ठिकानों के सरदार अपने दरबारियों, राजकीय अधिकारियों और पूरे लवाजमे के साथ सम्मिलित होते हैं | गाजे-बाजे के कारण क्षत्रिय नरेशों की राजधानियों में 'गण-गौरों' की सवारी के दृश्य का बनाव विशेष दर्शनीय बन जाता है | स्थानीय लोगों के साथ आस-पास के स्थानों की जनता भी बड़ी संख्या में एकत्र हो जाया करती है | क्षत्रिय नरेशों की राजधानियों में बूँदी के अतिरिक्त और सभी जगह 'गण-गौरि' की सवारी उत्साह के साथ निकाली जाती है | कितने ही स्थानों में मेले लगते हैं और उत्सव तीन-चार दिनों तक मनाया जाता है | घुड़दौड़, ऊँटों की दौड़ और पट्टेबाजी के मर्दाने खेल भी होते हैं | सच तो यह है कि अमीर-गरीब सबके यहाँ इस उत्सव की चहल-पहल रहती है | राजस्थान में केवल बूँदी ही ऐसी जगह है जहाँ राव बुधसिंह के भाई जोधसिंह के 'गण-गौरि' के दिन तालाब में नौका सहित डूब जाने के कारण 'हाडैने ले डूबी गणगौर' की कहावत चलने के साथ इस उत्सव का मनाया जाना बन्द हो गया | हिन्दुओं के गौरव स्थल मेवाड़ उदयपुर के 'गण-गौरि' महोत्सव का सुन्दर वर्णनn कर्नल जेम्स टाड ने अपने 'राजस्थान के इतिहास' में किया है |
  'गण-गौरि' त्यौहार के गीत
   स्त्रीयों के 'गण-गौरि' त्यौहार के गीत भी राजस्थान में अपनी विशेषता रखते हैं | उनमें भगवती गौरी की प्रार्थना के साथ समयोचित वासन्तिक प्रेमानुराग भी कूट-कूट कर भरा हुआ हैं | गीतों में गौरी के 'हिमाचल कन्या' होने का स्पष्ट वर्णन है | गौरी की प्रार्थना का नमूना देखिये -

            गौरि ए गौरि माता ! खोल किंवाड़ी,
            बाहर ऊबी थारी पूजनवाळी |
            पूजो ए पूजाओ बाई, काईंजी ! माँगो ?
            अन्न माँगाँ, धन माँगाँ, लाछ माँगाँ, लछमी ||
            जलहर जामी बाबळ माँगाँ रातादेई माई |
            कान कुँवर सो बीरो माँगाँ राईसी भौजाई
            ऊँट चढयो बहणोई माँगाँ चुड़ल वाली बहणल ||
                                                                                            इत्यादि

            गौरि ! तिहारेड़ा देसमें जी ! चोखीसी मेंहदी होय,
            सो म्हे ल्यायी थी पूजतां जी ! सो म्हारै अविचळ होय |
            गौरि ! तिहारेड़ा देसमें जी ! चोखो-सो काजळ होय,
            चोखो-सो गहणू होय, चोखो-सो कपड़ो होय,
            सो म्हे पहरयो थो पूजताँ ! सो म्हारै अविचळ होय |
                                                                                         इत्यादि

   इस   'गण-गौरि महोत्सव को बहुत से लोग केवल राजस्थान का लौकिक त्यौहार समझते हैं | इसमें सन्देह नहीं कि ; इस उत्सव के मनाने का प्रकार लौकिकता से खाली नहीं है, परन्तु इसके मूल में शास्त्रीयता की छाप लगी हुई है |  
 
निर्णयसिन्धु का वचन है -
            चैत्रशुक्लतृतीयायां गौरीमीश्वरसंयुताम् |
            सम्पूज्य दोलोत्सवं कुर्यात्    ||

देवीपुराण में लिखा है -
            तृतीयायां यजेद्देवीं शंकरेण समन्विताम् |
            कुक्कुंमागरुकर्पूरमणिवस्त्रसुगन्धकैः ||
            स्त्रग्गन्धधूपदीपैश्च नमनेन विशेषतः |
            आन्दोलयेत्ततो वत्सं शिवोमातुष्टये सदा ||

    इन वचनों का अर्थ स्पष्ट है | चैत्रशुक्ला तृतीया 'गण-गौरि' पूजा का निर्दिष्ट दिन है | उसमें सौभाग्य-तृतीया का महत्त्व भी समाया हुआ है

          

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